* चतुर्मुखी सनातन धर्म : तीसरा अंग : विश्व धर्म *

विश्व धर्म

हम जिस ईश्वर या परमेश्वर या भगवान या खुदा की कुछ पल से लेकर कुछ घंटे तक पूजा वंदना या इबादत करते हैं, उसे ही हम अपना धर्म मान लेते हैं.
लेकिन यह तो हमारे आस्था के केंद्र परमपिता परमेश्वर के प्रति हमारी श्रद्धा तथा भक्ति की ही अभिव्यक्ति होती है.
इस तरह से मात्र कुछ मिनिट से लेकर एकाध घंटे के लिए हम हमारे आराध्य परमेश्वर की आराधना में डूब कर उन्हें अपनी श्रद्धा तथा भक्ति के सुमन चढ़ाते हैं.
आपने कभी सोचा है कि इस तरह मात्र अधिक से अधिक एक घंटे से ज्यादा यानी कि हमारे प्रति दिन के मात्र 5% समय में की गयी भगवान की पूजा से आप धार्मिक कैसे कहला सकते हैं?
क्या आप अपने प्रति दिन के बाकी के 23 घंटे या अपने प्रतिदिन के 95% समय में धार्मिक रहते हैं?
बाकी के 95 % समय में घर-परिवार की सुरक्षा, ममत्व, उनका भरण-पोषण, आजीविका, व्यापार, राष्ट्र प्रेम, लोक हित आदि के सभी कार्यों को करते समय क्या आप खुद को धार्मिक मानते हैं?
सच्चाई यह है कि हम सभी तो हर समय संसार के अपने सभी कार्यों को करते समय भी धार्मिक ही रहते हैं,
क्योकि हम तो हर समय अपने सांसारिक कर्तव्यों का ही पालन कर रहे हैं.
जिसका पालन हम हर पल, हर दम यानी कि प्रति दिन 24 घंटे करते रहते हैं, वह ही हमारा सच्चा सनातन धर्म कहलाता है.
हमारा धर्म शाश्वत, सनातन, अजर, अमर तथा सुखदायक तभी कहला सकता है, जब वह हमारे हर जन्म में हर समय, हर पल हमारे ही साथ रहता हो.
अतः यह सांसारिक कर्तव्यों का पालन ही वास्तव में सनातन धर्म कहलाता है.
यह सनातन धर्म चतुर्मुखी या चार अंगो से विभूषित होता है जो कि इस प्रकार के होते हैं –
1. मातृत्व धर्म
2. राष्ट्र धर्म
3. विश्व धर्म
4. आत्म धर्म
हमारी पशु-पक्षियों की योनी या जन्म में भी हमारा यह सनातन धर्म अपने अस्तित्व को बनाते रखता है.
अतः हमारे किसी भी जन्म में, किसी भी योनी में, किसी भी अवस्था में हमारा साथ न छोड़े, वह ही हमारा सच्चा धर्म कहला सकता है.
अहो, धर्म तो धृ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है – धारण करना.
अतः जो आप हो, ऐसे अपने चतुर्मुखी सनातन धर्म का प्रतिपादन करने वाले शाश्वत चैतन्य स्वरुप आत्मदेव को जानना, मानना और धारण करना ही सनातन धर्म कहलाता है.
अनादिकाल से अभी तक के अनन्त वर्षो में ऐसे अपने सनातन धर्म को न मानने के कारण ही आपने –
a) चौरासी लाख योनियों में बारम्बार भ्रमण किया है ।
b) जितने भी प्राणी दिख रहे हैं उन सभी जीव–राशियो में प्रत्येक मनुष्य ने अनन्त बार भ्रमण किया है ।
c) जिस–जिस जगह पर आप जाते हो, वहां पर भी पूर्व में आपने अनन्त बार जन्म–मरण किया है ।
d) इस तरह जो कुछ भी दिखता है, वे सब भूमिकायें आपने अनन्त बार निबाही हैं.
e) इन सब भूमिकाओं में आपके आत्मदेव के ही फोटोग्राफ हैं,
f) अतः वे सब मिलकर आपके आत्मदेव का ही एलबम बनाते हैं.
सनातन धर्म के तीसरे सोपान में हम हमारी माँ वसुंधरा या पृथ्वी माँ के विश्व धर्म पर चर्चा करते हैं.
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माँ वसुंधरा का यह विश्व धर्म प्राकृतिक धर्म भी कहलाता है.
अतः माँ वसुंधरा का धर्म ही आपका नैसर्गिक गुण, शक्ति या स्वभाव वाला होता है.
इस संसार के किसी भी देश के किसी भी कोने या जगह पर चले जाइए, आपको हर जगह पर पग-पग में माँ वसुंधरा के विश्व धर्म से आपका परिचय होता रहेगा.
इस तरह हर देश, हर प्रान्त, हर समाज और हर सम्प्रदाय का नागरिक माँ वसुंधरा के इस विश्व धर्म का पालन करने वाला होता है.
आइये अब हम माँ वसुंधरा के इस विश्व धर्म पर विस्तार से चर्चा करते हैं –
माँ वसुंधरा अपनी सभी संतानों को पोषण, आश्रय, विश्राम और ममत्व प्रदान करती है.
माँ वसुंधरा ही हमारे इस शरीर का हर तरह से रक्षण, पोषण कर हमारा जीवन-चक्र चलाती है.
माँ वसुंधरा अपनी सभी महान शक्तियां जैसे कि सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, पवन, नदियाँ, समुद्र, वृक्ष आदि के द्वारा हम सभी का निःस्वार्थ भाव से लालन-पालन और पोषण करती है.
माँ वसुंधरा के आँचल की छाँव से छन कर आने वाली सूर्य की किरणों से ही सभी प्राणियों को रोशनी, प्रकाश, उर्जा और पोषण मिलता है.
माँ वसुंधरा के आश्रय में ही चन्द्रमा सभी को शीतल किरणों से प्रफुल्लित करता है.
माँ वसुंधरा की मधुर लोरी गुनगुनाते हुए पवन या हवा सभी को प्राणदायक वायु प्रदान करती है. हिटलर ने लाखों लोगो को मारा, फिर भी वसुंधरा माँ ने उसको आक्सीजन देना बंद नहीं किया था.
माँ वसुंधरा के आँचल में सितारों की तरह जड़े सभी पेड़-पौधे प्राणघातक वायु को गृहण कर जीवनदायक आक्सीजन को छोड़ते हैं और पत्थर मारने पर भी मधुर फल देते हैं.
माँ वसुंधरा की छत्र-छाया में सभी सागर नीलकंठ की भांति इस संसार की सभी तरह की गन्दगी को गृहण कर घनघोर मेघों की रचना कर अमृत जल की बारिश करवाते हैं.
माँ वसुंधरा ही सभी नदियों में जल, खेतों में हरियाली तथा भूखे-प्यासे को अन्न-जल देती हैं.
इस तरह से माँ वसुंधरा अपने आँचल की छाया में पात्र-अपात्र की चिंता किये बिना सभी प्राणियों को निस्वार्थ भाव से शक्ति, स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा संबल प्रदान करती रहती है.
माँ वसुंधरा की तरह ही उसकी संतानों या सभी प्राणियों की सेवा करना ही सच्चा सनातन विश्व धर्म होता है
दीन-दुखी, लाचार, बीमार, परेशान लोगो की मदद कर उनमे आशा का संचार करना ही विश्व धर्म कहलाता है
अतः आपका भी यह कर्तव्य है कि आप भी निस्वार्थ भाव से अच्छे-बुरे की चिंता छोड़कर अपना तन-मन-धन लगाकर वसुंधरा माँ की सभी संतानों की मदद करें, उन पर हमेशा उपकार करें,
अतः माँ वसुंधरा की सभी संतानों की सेवा ही सच्चा सनातन विश्व धर्म है
आप भी माँ वसुंधरा के सनातन विश्व धर्म का पालन कर सच्चे धर्मात्मा कहला सकेंगे.
फिर आप भी इन महान शक्तियों के समतुल्य होकर पामर से परमात्मा बन सकेंगे.
अतः आप सभी को अब साक्षी भाव से, वीतरागी भाव से इस सनातन विश्व धर्म को जानकर अब हमेशा इसका पालन करना चाहिये
तभी आप सभी धर्मों, सम्प्रदाय तथा जाति के विरोधाभास को दूर कर सनातन विश्व धर्म के अनुयायी बन सकते हैं.
अगर आप भी इस सनातन विश्व धर्म के अनुयायी बन बेबस, बीमार, कमजोर, लाचार और दुखी लोगो को माँ वसुंधरा की संतान मानकर उनकी मदद करते हैं, तो आप भी इस सनातन विश्व धर्म का पालन करते है.
आपकी आस्था के आपके वर्तमान के धर्म तो इस जन्म के साथ ही ख़त्म हो जायेंगे.
अतः आप उनका तो पालन करें ही, साथ ही आपके साथ हर समय रहने वाले शाश्वत, सनातन, अजर, अमर, सुखदायक चतुर्मुखी धर्मों का भी पालन करें, ताकि आप भी शाश्वत, सनातन, अजर, अमर होकर अक्षय अनंत सुख को पा सकें.
इस संसार के समस्त प्राणियों को कलियुग या पंचम काल के अंत तक स्वयं के शुद्ध आत्म-तत्व या चैतन्यदेव या चैतन्य सम्राट को प्रतिपादित करने वाले चतुर्मुखी सनातन धर्म का ज्ञान मिलता रहे,
चतुर्मुखी सनातन धर्म का पालन करने की प्रेरणा मिलती रहे,
इसके लिए सम्पूर्ण विश्व के हर कोने में समवशरण सेवा मंदिर बनाने की हमारी योजना है.
हमारे प्रस्तावित एक हजार आठ समवशरण सेवा मंदिरों में आपको इस चतुर्मुखी सनातन आत्म धर्म का इस युग के अंत तक सतत लाभ मिलता रहेगा.
अतः अब आप भी खुद को चतुर्मुखी सनातन धर्मी माने तथा इसके चारों अंग जैसे कि मातृत्व धारण, राष्ट्र धर्म, विश्व धर्म तथा आत्म धर्म का स्वरुप जानकार इस चतुर्मुखी सनातन धर्म का पालन करें.
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