राष्ट्र धर्म

* चतुर्मुखी सनातन धर्म : दूसरा अंग : राष्ट्र धर्म *

हम जिस ईश्वर या परमेश्वर या भगवान या खुदा की कुछ पल से लेकर कुछ घंटे तक पूजा वंदना या इबादत करते हैं, उसे ही हम अपना धर्म मान लेते हैं.
लेकिन यह तो हमारे आस्था के केंद्र परमपिता परमेश्वर के प्रति हमारी श्रद्धा तथा भक्ति की ही अभिव्यक्ति होती है.
इस तरह से मात्र कुछ मिनिट से लेकर एकाध घंटे के लिए हम हमारे आराध्य परमेश्वर की आराधना में डूब कर उन्हें अपनी श्रद्धा तथा भक्ति के सुमन चढ़ाते हैं.
आपने कभी सोचा है कि इस तरह मात्र अधिक से अधिक एक घंटे से ज्यादा यानी कि हमारे प्रति दिन के मात्र 5% समय में की गयी भगवान की पूजा से आप धार्मिक कैसे कहला सकते हैं?
क्या आप अपने प्रति दिन के बाकी के 23 घंटे या अपने प्रतिदिन के 95% समय में धार्मिक रहते हैं?
बाकी के 95 % समय में घर-परिवार की सुरक्षा, ममत्व, उनका भरण-पोषण, आजीविका, व्यापार, राष्ट्र प्रेम, लोक हित आदि के सभी कार्यों को करते समय क्या आप खुद को धार्मिक मानते हैं?
सच्चाई यह है कि हम सभी तो हर समय संसार के अपने सभी कार्यों को करते समय भी धार्मिक ही रहते हैं,
क्योकि हम तो हर समय अपने सांसारिक कर्तव्यों का ही पालन कर रहे हैं.
जिसका पालन हम हर पल, हर दम यानी कि प्रति दिन 24 घंटे करते रहते हैं, वह ही हमारा सच्चा सनातन धर्म कहलाता है.
हमारा धर्म शाश्वत, सनातन, अजर, अमर तथा सुखदायक तभी कहला सकता है, जब वह हमारे हर जन्म में हर समय, हर पल हमारे ही साथ रहता हो.
अतः यह सांसारिक कर्तव्यों का पालन ही वास्तव में सनातन धर्म कहलाता है.
यह सनातन धर्म चतुर्मुखी या चार अंगो से विभूषित होता है जो कि इस प्रकार के होते हैं –
1. मातृत्व धर्म
2. राष्ट्र धर्म
3. विश्व धर्म
4. आत्म धर्म
हमारी पशु-पक्षियों की योनी या जन्म में भी हमारा यह सनातन धर्म अपने अस्तित्व को बनाते रखता है.
अतः हमारे किसी भी जन्म में, किसी भी योनी में, किसी भी अवस्था में हमारा साथ न छोड़े, वह ही हमारा सच्चा धर्म कहला सकता है.
अहो, धर्म तो धृ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है – धारण करना.
अतः जो आप हो, ऐसे अपने चतुर्मुखी सनातन धर्म का प्रतिपादन करने वाले शाश्वत चैतन्य स्वरुप आत्मदेव को जानना, मानना और धारण करना ही सनातन धर्म कहलाता है.
अनादिकाल से अभी तक के अनन्त वर्षो में ऐसे अपने सनातन धर्म को न मानने के कारण ही आपने –
a) चौरासी लाख योनियों में बारम्बार भ्रमण किया है ।
b) जितने भी प्राणी दिख रहे हैं उन सभी जीव–राशियो में प्रत्येक मनुष्य ने अनन्त बार भ्रमण किया है ।
c) जिस–जिस जगह पर आप जाते हो, वहां पर भी पूर्व में आपने अनन्त बार जन्म–मरण किया है ।
d) इस तरह जो कुछ भी दिखता है, वे सब भूमिकायें आपने अनन्त बार निबाही हैं.
e) इन सब भूमिकाओं में आपके आत्मदेव के ही फोटोग्राफ हैं,
f) अतः वे सब मिलकर आपके आत्मदेव का ही एलबम बनाते हैं.
हमारे चैतन्य स्वभाव वाले चतुर्मुखी धर्म के दूसरे अंग राष्ट्र धर्म पर अब हम चर्चा करते हैं –

हमारा दूसरा धर्म हमारी राष्ट्र माँ या भारत माँ का राष्ट्र धर्म होता है.
हमारी राष्ट्र माँ या भारत माँ हमारे देश के प्रत्येक नागरिक को अपना पुत्र मानकर उसे आश्रय, अभय, सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और रोजगार देकर हमारा जीवनयापन करती है.
राष्ट्र धर्म भी शाश्वत है, सनातन है, अजर है, अमर है, सुखदायक है.
यही हमारा दूसरा धर्म यानी कि राष्ट्र धर्म कहलाता है.
अतः हमे चाहिए कि हम हमारे देश के प्रत्येक नागरिक को –
1. प्रत्येक नागरिक को इस शश्य श्यामल भारत भूमि का देशवासी मानें
2. प्रत्येक नागरिक को अपने परिवार के लालन-पालन तथा भरण-पोषण के सभी अवसर प्रदान करें.
3. प्रत्येक नागरिक को रोजगार या नौकरी के समान अवसर उपलब्ध करवाएं.
4. सभी देशवासियों के प्रति आपसी विश्वास, सामंजस्य तथा सम्मान की भावना रखें
5. प्रत्येक नागरिक को अभय, आश्रय, सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और आजीविका दिलवा कर इस राष्ट्र धर्म का पालन करे.
यह राष्ट्र धर्म ही एक ऐसा धर्म है जो अनादिकाल से है, अभी भी है और आगे आने वाले अनंत काल में भी रहेगा.
राष्ट्र धर्म एक ऐसा धर्म है जो अलग-अलग देशों में विभिन्न रीति-रिवाज तथा आस्थाओं के साथ भी पाया जाता है.
साथ ही यह राष्ट्र धर्म देश, समय, समाज, सम्प्रदाय, आस्था, काल, पुनर्जन्म आदि की सभी सीमाओं के पार जाकर मनुष्यों के साथ-साथ पशु-पक्षी, चींटी आदि में भी पाया जाता है.
अतः यह राष्ट्र धर्म शाश्वत है, सनातन है, अजर है, अमर है, सुखदायक है.
अतः आप किसी भी जाति, सम्प्रदाय या आस्था को मानने वाले हों, फिर भी आप राष्ट्र धर्मी हैं और अनंत काल तक रहेंगे.
अगर आप भी इस राष्ट्र धर्म का पालन कर बेबस, बीमार, कमजोर, लाचार और दुखी लोगो को अपने देश का नागरिक मानकर उनकी मदद करते हैं, तो आप भी इस राष्ट्र धर्म का पालन करते है.
आपकी आस्था के आपके वर्तमान के धर्म तो इस जन्म के साथ ही ख़त्म हो जायेंगे.
अतः आप उनका तो पालन करें ही, साथ ही आपके साथ हर समय रहने वाले शाश्वत, सनातन, अजर, अमर, सुखदायक चतुर्मुखी धर्मों का भी पालन करें, ताकि आप भी शाश्वत, सनातन, अजर, अमर होकर अक्षय अनंत सुख को पा सकें.
इस संसार के समस्त प्राणियों को कलियुग या पंचम काल के अंत तक स्वयं के शुद्ध आत्म-तत्व या चैतन्यदेव या चैतन्य सम्राट को प्रतिपादित करने वाले चतुर्मुखी सनातन धर्म का ज्ञान मिलता रहे,
चतुर्मुखी सनातन धर्म का पालन करने की प्रेरणा मिलती रहे,
इसके लिए सम्पूर्ण विश्व के हर कोने में समवशरण सेवा मंदिर बनाने की हमारी योजना है.
हमारे प्रस्तावित एक हजार आठ समवशरण सेवा मंदिरों में आपको इस चतुर्मुखी सनातन आत्म धर्म का इस युग के अंत तक सतत लाभ मिलता रहेगा.
अतः अब आप भी खुद को चतुर्मुखी सनातन धर्मी माने तथा इसके चारों अंग जैसे कि मातृत्व धारण, राष्ट्र धर्म, विश्व धर्म तथा आत्म धर्म का स्वरुप जानकार इस चतुर्मुखी सनातन धर्म का पालन करें.
फिर निश्चित ही आप अक्षय अनंत सुख की प्राप्ति कर मोक्ष महल में सदा के लिए निवास करेंगे.
किसी भी तरह की बीमारी, परेशानी, लाचारी , पीड़ा या जिज्ञासा के उचित निवारण के लिए संपर्क करें –
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