कंकर से शंकर बनें

* कंकर से शंकर बनें –
प्रत्येक परमाणु अमर तथा अनुपम शक्तिवान होता है
इसी तरह आप भी अमर तथा अनुपम शक्तिवान ही हैं.
आपके चैतन्यमयी आत्मदेव में
अनन्त शक्ति, अनन्त ज्ञान एवं अनन्त सुख
सरीखे अनन्त गुण समाये हुए हैं
आत्मदेव की असीम चैतन्य-शक्ति को पहचानने से आप भी
1. पामर से परमात्मा बन सकते हैं
2. पाषाण से परमेश्वर बन सकते हैं
3. खुद से खुदा बन सकते हैं
4. अधम से ईश्वर बन सकते हैं
5. भक्त से भगवान बन सकते हैं
6. कंकर से शंकर बन सकते हैं
अष्टावक्र गीता प्रकरण 6, सूत्र 1,2 भावार्थ में भी समझाया गया है कि –
1. आपका निज चैतन्यदेव तो आकाश के समान असीम है,
2. विशाल है,
3. सीमा रहित है,
4. लेकिन यह संसार तुच्छ घड़े की भांति प्रकृतिजन्य है, सूक्ष्म है, असार है. ऐसा मुझे ज्ञान हुआ है.
5. यह आत्मा समुद्र के समान विशाल है
6. लेकिन यह संसार तरंगों के समान विनाशीक है. ऐसा मुझे ज्ञान हुआ है.
7. अतः मैंने देख लिया है कि सिर्फ मेरा आत्मदेव ही एक है,
8. यही एकमात्र सत्य है;
9. जो दर्शाता है कि जहाँ न कुछ पाने को है;
10. न छोड़ने को है;
11. न राग है,
12. न विराग है;
13. न आसक्ति है,
14. न विरक्ति है;
15. न संसार है,
16. न मुक्ति है;
17. ऐसा मैं हूँ.
18. अब मुझ स्थितप्रज्ञ (ज्ञाता-द्रष्टा) ज्ञानी को इस संसार में किसका त्याग है,
19. किसका गृहण है,
20. किसका लय है,
21. किसका विलय है?
22. मैं आकाश के समान असीम,
23. समुद्र के समान विशाल हूँ;
24. लेकिन यह संसार तरंगों के समान तुच्छ है.
25. अतः अब आप भी साक्षी या वीतराग भाव से इस संसार को तुच्छ मानकर खुद के कंकर रुपी आत्मदेव को अपना शंकर या चैतन्य-सम्राट मान लें.